संपादकीय लेख “तिरछी नजर” क्या खास पढ़िए : एक ओर नक्सलमुक्ति की राह, दूसरी ओर पर्यावरण पर मंडराता लाल खतरा।

संपादकीय लेख “तिरछी नजर” क्या खास: एक ओर नक्सलमुक्ति की राह, दूसरी ओर पर्यावरण पर मंडराता लाल खतरा।
सुकमा जिला आज एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कभी नक्सलवाद के कारण देशभर में पहचान रखने वाला यह जिला अब विकास, शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य और प्रशासनिक पहुंच के नए अध्याय लिख रहा है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, शासन की योजनाओं और स्थानीय जनता के सहयोग से सुकमा नक्सलमुक्ति की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन केवल कानून-व्यवस्था की सफलता नहीं, बल्कि क्षेत्र के भविष्य के लिए नई उम्मीद का प्रतीक है।
लेकिन इसी बीच एक ऐसा मुद्दा सामने आ रहा है जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बैलाडीला क्षेत्र से लौह अयस्क खनन के बाद निकलने वाली लाल मिट्टी का सुकमा जिला मुख्यालय और आसपास के क्षेत्रों में कथित रूप से अवैध परिवहन और डंपिंग किया जाना चिंता का विषय है।
लाल मिट्टी देखने में सामान्य प्रतीत हो सकती है, लेकिन इसमें मौजूद खनिज तत्व, धूल और अपशिष्ट पर्यावरण, कृषि भूमि, जल स्रोतों तथा जीव-जंतुओं पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं। यदि बिना वैज्ञानिक परीक्षण और पर्यावरणीय मानकों के इस प्रकार की मिट्टी का परिवहन और डंपिंग किया जा रहा है, तो यह भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट का कारण बन सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि यह परिवहन और डंपिंग वैध है तो संबंधित विभागों द्वारा इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? और यदि यह अवैध है तो फिर जिम्मेदार विभागों की कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं दे रही? पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों की चुप्पी कई सवालों को जन्म देती है।
सुकमा जैसे आदिवासी बहुल जिले में जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि लोगों की जीवनरेखा हैं। जिस जिले में एक ओर सरकार और समाज मिलकर शांति, विकास और विश्वास का माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी उस विश्वास को कमजोर कर सकती है।
नक्सलमुक्ति का वास्तविक अर्थ केवल बंदूकों की आवाज थमना नहीं है, बल्कि ऐसा विकास सुनिश्चित करना भी है जो प्रकृति, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा करे। यदि विकास के नाम पर पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी की जाएगी, तो भविष्य में इसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन, पर्यावरण विभाग और संबंधित एजेंसियां इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करें। यदि लाल मिट्टी का परिवहन और डंपिंग नियमों के अनुरूप हो रहा है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जाए, और यदि अनियमितताएं पाई जाती हैं तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो।
सुकमा की पहचान अब संघर्ष से विकास की ओर बढ़ रही है। इसलिए यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास की यह यात्रा पर्यावरण संरक्षण के साथ आगे बढ़े, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, स्वच्छ और समृद्ध सुकमा मिल सके।
— संपादकीय , बस्तर समय




