
स्लरी पाइपलाइन परियोजना बस्तर के लिए विनाश का दस्तावेज़ — जल-जंगल-ज़मीन पर कॉरपोरेट हमला बर्दाश्त नहीं
रिपोर्टर, बालक राम यादव
सुकमा: कांग्रेस जिला अध्यक्ष हरीश लखमा ने बस्तर का लोहा आंध्रप्रदेश के अनकापल्ली तक ले जाने वाली स्लरी पाइपलाइन परियोजना को लेकर प्रदेश सरकार और कंपनी पर करारा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि ArcelorMittal की इस परियोजना को दी गई मंज़ूरी बस्तर के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। यह परियोजना आंध्रप्रदेश के लिए जितनी लाभकारी बताई जा रही है, उतनी ही बस्तर के लिए विनाशकारी सिद्ध होगी।
हरीश लखमा ने कहा कि इस परियोजना के तहत हर साल करीब 7 अरब लीटर बस्तर की एकमात्र बारहमासी शबरी नदी का पानी बर्बाद किया जाएगा। इससे खेतों में लाखों टन लाल ज़हर (स्लरी) फैलने का खतरा है, नदी-नाले जहरीले होंगे और खेती-किसानी के साथ-साथ पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।
राज्य के मत्स्य पालन विभाग ने शबरी नदी में पाई जाने वाली सुआन, ईल, बामी, मोगरी मछलियों तथा संकटग्रस्त श्रेणी के मेक्राब्रिकियम रोजनवर्गी झींगे की उपलब्धता का उल्लेख करते हुए रेत उत्खनन तक रोकने की अनुशंसा की है। ऐसे में इतनी भारी मात्रा में पानी की बर्बादी पर प्रदेश सरकार की उदासीनता अक्षम्य अपराध है।
उन्होंने कहा कि रोज़गार के नाम पर जनता को गुमराह किया जा रहा है—आंध्रप्रदेश में 50 हज़ार लोगों को रोज़गार का दावा है, जबकि बस्तर में सिर्फ़ 29 लोगों को। यह घोर अन्याय है।
परियोजना का पम्प हाउस सुकमा में स्थापित है, फिर भी कंपनी ने आज तक इस क्षेत्र की उपेक्षा की है। क्षेत्रीय विकास के नाम पर काग़ज़ों में काम दिखाकर करोड़ों रुपये की हेराफेरी की जा रही है।
हरीश लखमा ने इस बात पर कड़ा ऐतराज़ जताया कि सुकमा का पानी उपयोग करने वाली परियोजना की जनसुनवाई किरंदुल में रखी गई, जबकि वास्तविक रूप से प्रभावित सुकमा जिले के ग्रामीणों और आदिवासियों को न कोई सूचना दी गई, न भागीदारी का अवसर। यह सुनियोजित साज़िश है—ताकि बस्तर की आवाज़ दबाई जा सके। प्रभावित क्षेत्र से बाहर जनसुनवाई कराना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, पेसा कानून, पांचवीं अनुसूची और जनसुनवाई से जुड़े सभी वैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। कांग्रेस इसे फर्जी जनसुनवाई और लोकतांत्रिक अधिकारों की हत्या मानती है।
उन्होंने आगे कहा कि इस परियोजना से भारतीय रेल को हर साल 1,750 करोड़ रुपये (साढ़े सत्रह अरब) का नुकसान होगा। किरंदुल-कोत्तवलसा रेलमार्ग के दोहरीकरण में रेलवे 7,200 करोड़ रुपये खर्च कर रही है, जिसकी भरपाई पाँच वर्षों में लौह अयस्क ढुलाई से संभव है—लेकिन स्लरी पाइपलाइन से यह संभावना समाप्त हो जाएगी। स्पष्ट है कि उद्योगपतियों के मुनाफ़े को सार्वजनिक हित से ऊपर रखा जा रहा है।
मुनाफ़े की लालच में बस्तर की शबरी नदी के अस्तित्व को दांव पर लगाया जा रहा है। कांग्रेस चेतावनी देती है कि यदि जनसुनवाई को तत्काल सुकमा में पुनः आयोजित कर प्रभावित ग्रामसभाओं को विधिवत सूचना देकर उनकी सहमति नहीं ली गई, तो इस परियोजना और इसके विस्तारीकरण का पुरज़ोर, व्यापक और निर्णायक विरोध किया जाएगा—सड़क से सदन तक और आवश्यकता पड़ी तो न्यायालय तक। बस्तर के जल-जंगल-ज़मीन पर किसी भी कीमत पर कॉरपोरेट लूट स्वीकार नहीं की जाएगी।




